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जनक उवाचः
मेरे निरंजन रूप में, कहाँ पंचभूत विकार हैं,
कहाँ देह, मन, कहाँ इन्द्रियों, कहाँ शून्य पूर्ण प्रकार है.----१

हूँ निर्विषय सब भाव में,न ही द्वंद, है न अद्वंद है,
न तृप्ति, न तृष्णा, न मन, अब आत्मा स्वच्छंद है,------२

मेरे रूप को कहाँ रूपता,विद्या अविद्या है कहाँ?
अहम और ममकार अथवा बंध मोक्ष भी है कहाँ?------३

में निर्विशेष हूँ आत्मा, कहाँ कर्म और प्रारब्ध हैं,
और कहाँ कैवल्य, जीवन मुक्ति आदि प्रबंध हैं.--------४

शेष हैं भोक्तृत्व और कर्तृत्व आत्मानंद है,
निःस्वभावी, स्फुरण कहाँ ज्ञान फल के द्वंद हैं.-------५

स्व - स्वयम का रूप अद्वय , मैं स्वयं ही ज्ञान हूँ,
कहाँ बद्ध और मुमुक्ष, द्वैत के द्वंद, ऋत विज्ञानं हूँ.?-----६

मुझ अद्वैत स्वरुप को, सृष्टि कहाँ संसार है,?
कहाँ साध्य, साधन, सिद्धि साधक, आत्मा का प्रसार है.?----७

मैं शुद्ध, चेतन आत्मा,किंचित अकिंचित है कहाँ,?
अनु, लघु, महिमा, प्रमाता और प्रमाणित है कहाँ?------८

सर्वदा निष्क्रिय कहाँ, विक्षेप और एकाग्रता ?
मूढ़ता, अज्ञान, सुख और है कहाँ पर व्यग्रता ?-----९

वृति ज्ञान शून्य स्वरुप,अब मुझमें कहाँ व्यवहार है ?
सुख कहाँ और दुःख कहाँ, परमार्थता से पार है?-----१०
 
[काव्यानुवादः डॉ. मृदुल कीर्ति]

 

Janaka said:

In my unblemished nature there are no elements, no body, no faculties,
no mind. There is no void and no despair. 20.1

For me, free from the sense of dualism, there are no scriptures, no
self-knowledge, no mind free from an object, no satisfaction and
no freedom from desire. 20.2

There is no knowledge or ignorance, no "me," "this," or "mine,"
no bondage, no liberation, and no property of self-nature. 20.3

For him who is always free from individual characteristics there is no
antecedent causal action, no liberation during life, and
no fulfilment at death. 20.4

For me, free from individuality, there is no doer and no reaper of
the consequences, no cessation of action, no arising of thought,
no immediate object, and no idea of results. 20.5

There is no world, no seeker for liberation, no yogi, no seer,
no one bound and no one liberated. I remain in my own
nondual nature. 20.6

There is no emanation or return, no goal, means, seeker or
achievement. I remain in my own nondual nature. 20.7

For me who am forever unblemished, there is no assessor, no standard,
nothing to assess, and no assessment. 20.8

For me who am forever actionless, there is no distraction or
one-pointedness of mind, no lack of understanding, no stupidity,
no joy and no sorrow. 20.9

For me who am always free from deliberations there is neither
conventional truth nor absolute truth, no happiness and no suffering. 20.10

[Translation by John Richards]